राजस्थान में ऊंटों की संख्या पिछले 45 सालों में करीब 90 प्रतिशत तक घट चुकी है। यह मामला अब राजस्थान हाईकोर्ट तक पहुंच गया है और अदालत ने राज्य सरकार से इस पर जवाब मांगा है।
मामला क्या है
राजस्थान का राज्य पशु ऊंट एक समय यहां के रेगिस्तानी इलाकों में बड़ी तादाद में पाया जाता था। लेकिन दशकों के दौरान इनकी संख्या में भारी गिरावट आई है। जो ऊंट कभी लाखों की संख्या में थे, वे अब बेहद कम रह गए हैं। राजस्थान हाईकोर्ट ने इस गिरावट को गंभीरता से लेते हुए सरकार से पूछा है कि आखिर इसके लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।
क्यों घट रहे हैं ऊंट
ऊंटों की संख्या में इस भारी कमी के पीछे कई कारण बताए जाते हैं।
- आधुनिक परिवहन के साधनों की वजह से ऊंटों की उपयोगिता काफी कम हो गई है।
- पशुपालकों को ऊंट पालने में आर्थिक फायदा नहीं दिखता, इसलिए वे इससे दूर हो रहे हैं।
- चारे और पानी की कमी के साथ-साथ चराई की जमीन भी सिकुड़ती जा रही है।
- ऊंट के दूध और ऊन के लिए बाजार पर्याप्त नहीं होने से पालकों की आमदनी नहीं बन पाती।
- सरकारी योजनाओं का लाभ सही तरीके से ऊंट पालकों तक नहीं पहुंच पाना भी एक वजह मानी जाती है।
हाईकोर्ट की सख्ती
राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले में राज्य सरकार और संबंधित विभागों से जवाब तलब किया है। अदालत यह जानना चाहती है कि ऊंटों को बचाने के लिए सरकार की तरफ से अब तक क्या ठोस कदम उठाए गए हैं और आगे की क्या योजना है।
ऊंट को राजस्थान ने 2014 में राज्य पशु घोषित किया था। इसके बाद ऊंट के वध और राज्य से बाहर ले जाने पर पाबंदी भी लगाई गई थी। लेकिन इन कानूनी प्रावधानों के बावजूद जमीनी स्तर पर ऊंटों की संख्या में गिरावट रुकी नहीं है।
पशुपालकों पर असर
ऊंटों की घटती संख्या सिर्फ जैव विविधता की समस्या नहीं है — इससे उन हजारों परिवारों की रोजी-रोटी भी प्रभावित होती है जो पीढ़ियों से ऊंट पालन पर निर्भर रहे हैं। राजस्थान के थार रेगिस्तान इलाके में रेबारी, राइका जैसे समुदाय परंपरागत रूप से ऊंट पालते आए हैं। इन समुदायों के लिए यह केवल एक पशु नहीं, बल्कि जीवनयापन का जरिया और सांस्कृतिक पहचान भी है।
अब देखना यह होगा कि हाईकोर्ट की नोटिस के बाद राज्य सरकार ऊंट संरक्षण को लेकर क्या जवाब देती है और कोई नई नीति लाती है या नहीं।

