दुनिया भर में बच्चों के स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के अंधाधुंध इस्तेमाल को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है और कई देश इस पर सख्त पाबंदियां लगा चुके हैं। भारत में भी यह सवाल तेज होता जा रहा है कि आखिर बच्चों को डिजिटल नुकसान से बचाने के लिए कब और कैसे कदम उठाए जाएंगे — और राजस्थान में इस दिशा में अब तक क्या हुआ है।
दुनिया में क्या हो रहा है
ऑस्ट्रेलिया ने हाल ही में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने का कानून पास किया है। फ्रांस भी स्कूलों में मोबाइल फोन बैन करने वाले देशों में शामिल हो चुका है। इसके अलावा ब्रिटेन, नॉर्वे और कई अन्य यूरोपीय देशों ने भी बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए नए नियम बनाए हैं।
- ऑस्ट्रेलिया: 16 साल से कम उम्र के बच्चों पर सोशल मीडिया बैन
- फ्रांस: स्कूलों में स्मार्टफोन पर पाबंदी
- ब्रिटेन: बच्चों की डेटा सुरक्षा के लिए सख्त कानून
- नॉर्वे: बच्चों के लिए सोशल मीडिया अकाउंट की उम्र सीमा तय
विशेषज्ञों का कहना है कि ज्यादा स्क्रीन टाइम बच्चों की नींद, पढ़ाई, मानसिक सेहत और सामाजिक विकास सभी पर बुरा असर डालता है। चिंता की बात यह है कि भारत में इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले बच्चों की तादाद तेजी से बढ़ रही है।
राजस्थान में क्या है हाल
राजस्थान में भी स्कूलों और अभिभावकों के बीच बच्चों के मोबाइल उपयोग को लेकर बहस तेज हुई है। कुछ सरकारी स्कूलों में कक्षाओं के दौरान फोन लाने पर रोक है, लेकिन राज्य स्तर पर कोई व्यापक कानून या नीति अब तक सामने नहीं आई है।
शिक्षा विभाग से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक, बच्चों को ऑनलाइन सामग्री के नुकसान से बचाने की जरूरत तो महसूस की जा रही है, लेकिन इसके लिए कोई ठोस नीति अभी तक लागू नहीं हुई है।
असर किस पर और कितना गहरा
डॉक्टरों और मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, बच्चों में मोबाइल की लत से चिड़चिड़ापन, नींद न आना, पढ़ाई में मन न लगना और अकेलापन जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। छोटे बच्चों में आंखों की कमजोरी भी एक बड़ी शिकायत बनती जा रही है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर मौजूद गलत या हानिकारक कंटेंट तक बच्चों की आसान पहुंच भी माता-पिता की एक बड़ी चिंता है। शहरों में ही नहीं, अब ग्रामीण इलाकों में भी यह समस्या देखी जा रही है।
आगे क्या हो सकता है
केंद्र सरकार के स्तर पर डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन कानून के तहत बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा के प्रावधान बनाए गए हैं, लेकिन इन्हें अमल में लाना अभी बाकी है। जानकारों का मानना है कि जब तक स्कूल, परिवार और सरकार मिलकर कोई साझा रणनीति नहीं बनाते, तब तक सिर्फ पाबंदियों से कुछ खास नहीं बदलेगा।
फिलहाल बच्चों के डिजिटल इस्तेमाल को लेकर पूरी जिम्मेदारी बड़े हद तक परिवारों पर ही टिकी है।

