निर्जला एकादशी पर श्रीनाथजी मंदिर में उमड़े हजारों श्रद्धालु, कलियों से सजे दिव्य दर्शन

निर्जला एकादशी पर नाथद्वारा स्थित श्रीनाथजी मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। भगवान को कलियों के विशेष श्रृंगार में दिव्य दर्शन दिए गए।

निर्जला एकादशी पर श्रीनाथजी मंदिर में उमड़े हजारों श्रद्धालु, कलियों से सजे दिव्य दर्शन

राजस्थान के नाथद्वारा स्थित प्रसिद्ध श्रीनाथजी मंदिर में निर्जला एकादशी के मौके पर श्रद्धालुओं का बड़ा हुजूम उमड़ पड़ा। इस पावन तिथि पर भगवान श्रीनाथजी को फूलों की कलियों से विशेष रूप से सजाया गया और भक्तों को दिव्य दर्शन कराए गए।

क्या है निर्जला एकादशी का महत्व

हिंदू पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को निर्जला एकादशी कहा जाता है। इसे सभी एकादशियों में सबसे कठिन और सबसे पुण्यदायी माना जाता है। इस दिन व्रत रखने वाले भक्त पूरे दिन पानी तक ग्रहण नहीं करते। मान्यता है कि इस एक एकादशी का व्रत पूरे साल की सभी 24 एकादशियों के बराबर फल देता है।

यही वजह है कि हर साल इस तिथि पर देशभर से श्रद्धालु नाथद्वारा पहुंचते हैं और श्रीनाथजी के दरबार में माथा टेकते हैं।

मंदिर में खास श्रृंगार और दर्शन

निर्जला एकादशी पर श्रीनाथजी मंदिर की सजावट और श्रृंगार हमेशा खास होती है। इस बार भगवान को ताजी फूलों की कलियों से सजाया गया, जिसे देखकर भक्त मंत्रमुग्ध हो गए। मंदिर परिसर में सुबह से ही दर्शन के लिए लंबी कतारें लग गईं।

  • भगवान श्रीनाथजी को कलियों के विशेष श्रृंगार में दर्शन दिए गए।
  • सुबह के मंगला दर्शन से लेकर रात की शयन आरती तक भक्तों की भीड़ बनी रही।
  • मंदिर प्रशासन ने व्यवस्था बनाए रखने के लिए विशेष इंतजाम किए।
  • राजस्थान के अलावा गुजरात, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे।

श्रद्धालुओं की उमड़ी भीड़

एकादशी के दिन नाथद्वारा शहर में सुबह से ही रौनक दिखी। हर तरफ भजन-कीर्तन की आवाजें गूंजती रहीं। बाजारों में प्रसाद, फूल और पूजा सामग्री की दुकानों पर भी भीड़ देखी गई। स्थानीय प्रशासन ने भीड़ को देखते हुए यातायात और सुरक्षा के अतिरिक्त इंतजाम किए।

बुजुर्ग, युवा और बच्चे — सभी एकादशी की इस परंपरा में बढ़-चढ़कर शामिल हुए। कई परिवार रात से ही मंदिर के बाहर डेरा डाले रहे ताकि सुबह मंगला दर्शन का लाभ उठा सकें।

श्रीनाथजी मंदिर की खासियत

नाथद्वारा का श्रीनाथजी मंदिर वैष्णव संप्रदाय के सबसे प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है। यहां भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा होती है। हर त्योहार और पर्व पर यहां विशेष श्रृंगार और झांकियां सजाई जाती हैं, जो भक्तों को बार-बार खींच लाती हैं।

निर्जला एकादशी जैसे पर्व पर यह मंदिर श्रद्धा और आस्था का केंद्र बन जाता है और पूरे माहौल में एक अलग ही भक्तिमय ऊर्जा महसूस होती है।

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