ताजमहल को दुनिया प्यार की सबसे बड़ी निशानी मानती है, लेकिन इस खूबसूरत इमारत के पीछे एक औरत की ऐसी कहानी है जो बेहद दर्दनाक है। मुमताज़ महल, जिनकी याद में शाहजहां ने यह मकबरा बनवाया, उनकी जिंदगी जितनी शानदार दिखती थी, उससे कहीं ज्यादा कठिन थी।
कौन थीं मुमताज़ महल
मुमताज़ महल का असली नाम अर्जुमंद बानो बेगम था। वे मुगल दरबार के एक ताकतवर परिवार से थीं। शाहजहां से निकाह के बाद वे बेगम के तौर पर मुगल सल्तनत की सबसे करीबी हमसफर बन गईं। शाहजहां उनसे बेहद मोहब्बत करते थे और वे हर सफर में उनके साथ रहती थीं।
लेकिन यही उनकी तकलीफ की सबसे बड़ी वजह भी बनी। लगातार सफर, युद्ध के मैदानों तक जाना और बार-बार मां बनना — इन सबने उनकी सेहत पर गहरा असर डाला।
मौत की वजह और हालात
मुमताज़ महल की मौत बच्चे को जन्म देते वक्त हुई थी। यह उनका चौदहवां बच्चा था। उस दौर में प्रसव के दौरान मौत बेहद आम थी, लेकिन एक मलिका के लिए यह अंत किसी त्रासदी से कम नहीं था। उनकी उम्र उस वक्त करीब अड़तीस साल थी।
- मुमताज़ महल की मौत 1631 में बुरहानपुर (मध्य प्रदेश) में हुई थी।
- शाहजहां को यह खबर सुनकर गहरा सदमा लगा था।
- बाद में उनके पार्थिव शरीर को आगरा लाया गया।
- ताजमहल का निर्माण करीब 1632 में शुरू हुआ और लगभग 1653 तक पूरा हुआ।
ताजमहल: प्यार या अपराधबोध
इतिहासकारों के बीच यह बहस पुरानी है कि ताजमहल सिर्फ प्यार की निशानी है या उसमें शाहजहां का अपराधबोध भी शामिल था। मुमताज़ ने अपनी पूरी जिंदगी शाहजहां के साथ चलते हुए गुजारी, और उनकी मौत भी उसी सफर में हुई। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि लगातार गर्भधारण और थका देने वाले सफर ने उनकी जिंदगी छोटी कर दी।
ताजमहल की हर दीवार, हर नक्काशी उस दर्द की गवाह है। आज यह इमारत यूनेस्को की विश्व धरोहर है और हर साल लाखों लोग इसे देखने आते हैं। पर बहुत कम लोग रुककर सोचते हैं कि इसके अंदर दफन उस औरत ने क्या जिया।
आज भी जिंदा है उनकी याद
आगरा में ताजमहल के भीतर मुमताज़ महल की कब्र आज भी मौजूद है। उनके ऊपर बनाया गया यह मकबरा दुनिया की सबसे खूबसूरत इमारतों में गिना जाता है। मुमताज़ की कहानी हमें याद दिलाती है कि इतिहास की चमकदार इमारतों के पीछे अक्सर किसी इंसान की खामोश कुर्बानी होती है।

